पत्ते पर गिर कर सूख गई ,लौट चली आसमान की ओर, खत्म जीवन का शोर
चाह थी की पा लूगी इसी जन्म मे विराम ,आना पडेगा फिर धरती पर जब छाएगे बादल श्याम
अगले जन्म मे भी होगा कि नही सागर से मिलन, सोच आज घबडाता मन
रोक लेती है कभी पुष्प की चाह, देख सुन्दरता चल पडी चूमने ,यही बन गया था गुनाह
इस बार सब ओर से निगाह फेर बीच धार मे बहती हूॅ ,सबको करती होशियार ये कहती हूॅ
इस पर भी कई बूॅदे बैठ जाती पेडो की डाल, फिर सुखा देती जीवन धूप, कहती हूॅ बचो लालसा से यह है अंध कूप
कहती हूॅ सबसे निगाह फेर लो यह माया ,इसी की चाह ने हमे बार बार सुखाया
तेजी से बह चलो समुद्र की ओर ,करो केवल उसका ध्यान मत पडो इन आकर्षण मे, ये तुम्हे कर देगे कमजोर
पर कहते है सबका निर्धारित जीवन पथ है सब उसी अनुसार बहते यह सत्य अकथ है
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