पत्थर पर लिख कर राम तैराता हू बार- बार, पर लिखाई कमजोर होने से डूब जाते बीच मजधार
सोचता हूॅ जीवन बढ रहा मंजिल की ओर ,पडने लगा शरीर कमजोर .कैसे करूगा मै सागर पार, नही बन पाई सेतू की एक कतार
करता हूॅ ध्यान होकर सावधान स्वास- स्वास पर लिख राम नाम, बार बार फेर रहा हूॅ लकीर हो कर गम्भीर
हर पल साॅसे हो रही कम ,जल्दी करना पडेगी पता नही कब निकल जाएगा दम
सिर उपर कर रहा पुकार, डूब जाउगा तुम ही सहाय बीच मजधार
हे मेरे राम हाथ बढाओ जैसे गज को बचाया मुझे भी बचाओ
हे श्याम द्रोपदी की सुन पीर आप बन गये चीर
मै भटकता फिरता लगता है कि चढजाउगा कि फिर गिरता हूॅ अब बस तेरा सहारा बनेगा सेतू मिलेगा किनारा
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