
वह मिली थी एक बरसात की रात ,चले थे हम कुछ दूर तक साथ
शाम ढल रही थी हो रही थी रात ऐसे मे वह भीगती जा रही थी मै भी था उसी राह उस पर पडी निगाह तो कहाॅ आ जाईए एक साथ चलते है
मानव मन की पुकार को कर स्वीकार चल पडी साथ न मैने कुछ कहा न उसने की बात
आज फिर वैसी ही बरसात की रात इतने साल बाद आ रही उसकी याद
बता नही सकता उसके साथ चलने का एहसास न जाने क्यो मन करता है कि वह है यही आसपास
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