कल तक लोग इसमे भी सवार थे जो थामे थे पतवार आज चिडिया उड रही कर नही नये नाविक का इंतजार
कल उनको भी था गुमान कि हमी एक ताकत वर इंसान पर आज सब सूना वीरान
कल तक जो लडते थे बीच पानी की धार उनकी साॅसे उखड गई जब आई किनार
ऐसा ही जीवन का खेल है निराला जो किसी से नही हारा उसे उसका अपना गम मार गया वह अपने से ही हार गया
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