मेरे गाॅव का वह बरगद मुझे आज भी याद इतने साल बाद
जो मेरे दादा की उमर से बडा था जाने कब से खडा था
गर्मी की तपती धूप मे वही थी छाॅव उसके नाम से पहचाना जाता था गाॅव
धूप खाये बैल और गाय वही बैठ सुस्ताए हम भी गर्मी की चाौपाल सजाए
दोने और पत्तल वाले आते और पत्ते तोड दोना बनाते अपना रोजगार चलाते
हजारो हजारो जीव उसपर रहते और पलते ऐसे पेड अब देखने को नही मिलते
उसकी लडकती जटाए सालो से तपस्या मे लीन तपस्वी की याद दिलाए
पता चला एक नालायक ने उसे कटवाय जिसने उसकी छाया मे अपना बचपन बिताया
सच आदमी सबसे बडा नमक हराम है उसे बस अपने मतलब से काम है
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