बचपन की अलग ही है बात तब तो सूरज को भी छू सकते थे हाथ
तब तो चाॅद की करते थे सवारी चरखे वाली बुढिया की बाते प्यारी
तारो के बगीचे का खेल चंदा मामा से वह अपना मेल
सब आज सपना हो गया हकीकत के कठोर व्यवहार से खो गया
तब तो चाॅद की करते थे सवारी चरखे वाली बुढिया की बाते प्यारी
तारो के बगीचे का खेल चंदा मामा से वह अपना मेल
सब आज सपना हो गया हकीकत के कठोर व्यवहार से खो गया

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