Wednesday, December 7, 2016

आज नही वो सुन्दर सपने तब कहाॅ था कोई पराया दुश्मन भी थे अपने

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बचपन की वह नीद न जाने कहाॅ खो गई ,अब तो रात जागने की आदत सी हो गई
कभी भी सो जाओ कर लो आॅखे बंद ऐसा लगता रात हो गई, चाॅद तारो से बात हो गई
रात मे समय से पहले सोना और भोजन करने मे रोना ,माॅ का अपने हाथ से प्यार से खिलाना ,कह खो गया वो जमाना
आज नही वो सुन्दर सपने तब कहाॅ था कोई पराया दुश्मन भी थे अपने

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