बचपन की वह नीद न जाने कहाॅ खो गई ,अब तो रात जागने की आदत सी हो गई
कभी भी सो जाओ कर लो आॅखे बंद ऐसा लगता रात हो गई, चाॅद तारो से बात हो गई
रात मे समय से पहले सोना और भोजन करने मे रोना ,माॅ का अपने हाथ से प्यार से खिलाना ,कह खो गया वो जमाना
आज नही वो सुन्दर सपने तब कहाॅ था कोई पराया दुश्मन भी थे अपने
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