करता तपस्या
कठोर
की
गंगा
जी
धरती
पर
आए,
भागीरथ
प्रार्थना कर शिव को
मनाए
गंगा जी
प्रसन्न हो भागीरथ से
बोली
मेरा
प्रचंड
वेग
कोई
न
सह
पाए,
एक
शिव
ही
है
जो
यह
भार
उठाए
शिव बोले
मै
तुम
पर
प्रसन्न मैने खोली जटाएॅ,
बोलो
गंगा
जी
उतरे
और
इनमे
समाएॅ
गंगाजी उतरी
और
जटाओ
मे
ऐसी
समाई,
कि
फिर
निकल
न
पाई,
शिव
का
कहाॅ
पार,
वह
तो
अपार
प्रभु छोडो
दो
गंगाजी
की
धार
,की
मेरे
कुल
का
हो
उद्धार,
मर
गये
मुनि
के
शाप
से
पचास
हजार
गंगाजी उतर
आई
करने
हमारा
उद्धार,
पीढियो
को
दिया
तार,
जी
रहा
उनपर
आश्रित
हो
समूह
अपार
इतने शुद्ध
जल
मे
मिलाने
लगे
हम
कूडा
कचरा
और
अपना
मल
,अब
आपही
बताओ
कैसा
होगा
हमारा
कल
छोड दो
यह
पाप,
तुम्हे
कोई
नही
कर
सकता
माफ
,बदल
लो
अपना
काम
,वरना
तैयार
रहो
सहने
को
अंजाम
माॅ को
पहनाओ
आज
हरी
चुनर
,उगा
दो
पेड
किनारे
की
धरती
पर
,इसके
पीछे
बनाओ
छोटे
छोटे
तलाब
,फिर
देखो
पूरे
कैसे
होते
हर
ख्वाब
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