रूठ कर सोन से बह निकली उल्टी धार, सब बहते पूरब की ओर इन ने पश्चिम की ओर बहना किया स्वीकार
नही निकली हिम पर्वत से मिला इन्हे विघ्याचल और सतपुडा दो भाइयो का प्यार ,इनके बीच बहती गुजरात तक इनका विस्तार
नमामि देवी नर्मदे पुण्यगान, दर्शन मात्र से हो जाता सब समाधान, कितना भव्य स्वरूप कितना अनूप
कल- कल छल -छल प्रवाह ,दर्शन से हो जाते दूर सब गुनाह, किनारे है ज्ञान का स्थान, यही शंकराचार्य ने पाया ज्ञान
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