फूलो से धरती कर के श्रृंगार क्यो बैठी इस प्रकार
किसका करती तुम इंतजार ,किसके लिये किया श्रृंगार
मेरा लाल मेरा प्यारा अपनी माॅ का दुलारा
आज गुजरेगा यहाॅ से ,जाता है ऋण चुका के जहाॅ से
कल आतंकियो से लडते लडते दे दी जान, उसके लिये सजया यह सामान
देखो आज उसके लिये आसमान भी रोता है ,जिन्हे तुम शबनम कहते उससे मुझको भीगोता है
इतना ही देख पाते की परिवार रोता है ,पर जब कोई जवान शहीद होता है ,सारा जहाॅन रोता है
इन फूलो को देखो मचल रहे उसको छूने के लिये, जिसने अपनी धरती के लिये देदी जान, छूकर मेरे लाल करदे इनपर एहसान।
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