Monday, December 5, 2016

अन्नत यात्रा का पथिक चल पडा क्या छोटा क्या बडा

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कही मौत का मातम कही है जन्म की खुशी कोई आए कोई जाए दुनिया बसी की बसी
इधर बज रही बधाई उधर शहनाई रोती है कही जन्म की किलकारी कही मौत रोती है
सालो से चल रहा यही खेल पर माया उपरवाले की इतनी सघन हर आदमी रोज मौत देख रहा पर मगन
जिस संसार को अपना समझा वह बेगाना हो गया आज मौत का मातम खत्म कल जमाना अपने मे खो गया
ऐसा नही की कोई एक भूला है भूले है सभी मौत समने देख याद आता कभी कभी
यह तो पडाव है जिसे समझे मंजिल तैयारी करो और निकल पडो यही बस हासिल
शरीर को मौत आती है मिट्टी मिट्टी मे मिल जाती है
अन्नत यात्रा का पथिक चल पडा क्या छोटा क्या बडा

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