Sunday, July 2, 2017

लोगो को भी यह लुभाती है मुझे एक भ्रम छलावा बनाती है

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जुल्फ की तरह उलझनो ने भी है घेरा चाहती हूॅ सुलझ जाए पर सुलझती नही हो जाता सबेरा। लोगो लगता ये मेरी सुन्दरता को बढाती पर मै जानती हूॅ सुलझाने मे कितनी उलझ जाती। इसे मे जीवन गुजर रहा है कुछ सुलझती तो लगता सवॅर रहा है। शायद इस खेल मे मेरा हो रहा विकास अब घबराहट नही होती करने मे प्रयास। मै जनती हूॅ इन्हे पूरा सुलझना नही है कभी तो क्यो करू फिकर की चल रहा है जीवन भी अभी। सब सुलझना तो मौत है या है जीवन से सन्यास इस लिये मैने शिथिल कर दिये है प्रयास। अभी उलझनो का आनंद है रोज घन घटा समान घेरती है कुछ करने को प्रेरित करती पेरती है। लोगो को भी यह लुभाती है मुझे एक भ्रम छलावा बनाती है।

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