इस पर भी कहते है पीने लायक पानी धरती पर कम है मै कहता हमारा सहेजने का प्रयास है कम
झरझर जैसे बरस रहा नही लगता की उपर वाले की दया कम उसने तो दिया भरपूर जितना समेटना समेट लो जितना है दम
पानी के लिये रोज लडते है परहमारे प्रयास नही बढते है आया समय जैसे गुजर जाता वैसे ही पानी बह निकल जाता
इस लिये पानी के लिये शरीर का पसीना बहाओ हर साल पानी बचाने की कोई एक रचना बनाओ
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