Sunday, December 4, 2016

आॅख खोलू तो वो है बंद करू तो उससे होती बात

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पवित्र मन को पाने के लिये कराना पडता मन को स्नान जोकि नही आसान
इसके लिये करना पडती पूरी सफाई इश्वर प्रेम से धुलाई
जब पूरा मन उसके प्रेम मे डूब जाता है तब मन निर्मल हो जाता है
उस निर्मन मन को पाने के लिये करना पडता सपूर्ण त्याग तब जागता श्री हरि से अनुराग
मन ठिकाने लाने के लिये भटकता छोड सब आस मन मे कर उसका विश्वास
छोड दिये सब वस्त्र विचार बदल लिया अंदरूनी बाहरी व्यवहार
अब बैठा उसके नाम की धूनी रमाए जो अपने थे वे भी हो चुके पराए
इतने दिनो बाद लगा कि वो आकर बैठ गया दिन रात आॅख खोलू तो वो है बंद करू तो उससे होती बात


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