खत्म हुई आज की अठखेलिया बूझी अन बूझी पहेलिया कल देगे अब इस खेल को विस्तार
नही दोस्त न जाओ कल नही होता जीवन तो बस है इस पल रूको की मन जाएगा बहल
नही देखो मेरी हो रही पुकार चाॅदनी चलदी होने लगा उजियार
सम्बन्धो की रात फिर आएगी चाॅदनी अपनी शीतलता फिर लुटाएगी
लहरो मे फिर होगा वह संगीत तुम्हे कल फिर मिलेगा तुम्हारा मन मीत
नही मै तो तुममे डूब आज ही हो जाउगा पार नही देखूगा उजियार
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